Thursday, December 14, 2017
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sl.num.004 बढ़ जाने दो गलत-फहमियाँ….mishra’s lover

Sl.num.004

दिन ,सफते और महीने बड़े ही तेजी से गुजर रहे थे । कभी-कभी रोज ,
कभी कुछ दिन के बाद , तो कभी कुछ ज्यादा दिन के बाद ,अब कही न कही बो मुझे मिल ही जाती।
कभी बाजार मे , कुछ खरीदते हुये, किसी गली मे , कही जाती हुयी । कभी अपनी सहेलियों के साथ
तो कभी अकेली ।कभी कॉलेज की ड्रेस मे तो कभी रंग-बिरंगे कपडो मे , कभी हस्ते हुये तो कभी मुसकुराते हुये।
पर हाँ इसके अलावा आज-कल कुछ अलग है तो …. की वो अब पहले की तरह अंजान नहीं रहती ।पहले
सिर्फ मेरी नजरे उस पर टिकती थी और अब उसकी भी नजरे टिकती है,मुझ पर।पहले सिर्फ मे उसे ढूँढता था
, पर अब तो वो भी मुझे ढूंढती है ,ऐसा मुझे लगता है। पहले सिर्फ मे उसे पहचानता था , अब तो बो भी मुझे
फटाफट से पहचान लेती है।
एक बार बो मुझे ठीक सब्जी मंडी के सामने दिखी । साइकल थी उसके पास फिर भी
अपनी सहेलियों के साथ पैदल ही चल रही थी । किताबों से भरा बेग भी था उसके पास।
मैंने काफी दूर पहले से ही उसे पहचान लिया था।लेकिन जैसे जैसे मेरे और उसके बीच की
दूरी कम हुयी,मैं उसकी तरफ झाँका भी नहीं था। क्यूंकी मेरे उसके बीच की गलत फहमियाँ
बढ़ती ही जा रही थी । तो मैंने सोचा,इन्हे थोड़ा सा कम कर लू । इसी बिचार के साथ मे उसे
क्रॉस कर गया । लेकिन क्रॉस करने के एकदम फ़ाइनल मूवमेंट पर मुझ पर मानो मेरा
जैसे कंट्रोल ही नहीं था । ओर मेरी नजर उस पर चली गयी ।उस एक पल मे सब कुछ
तहस नहस हो गया । गलत फहमियाँ दूर करने के चक्कर मे और ज्यादा बढ़ गयी ,
क्यूंकी वो ऑलरेडी मुझ पर ही थी ।
उस एक सेकंड के आइ-कांटैक्ट ने सब कुछ बदल कर रख दिया। एक पल के लिए मुझे
लगा, जेसे उसकी आँखें कह रही हो ,बढ़ जाने दो गलत-फहमियाँ।उस एक पल मे मेरे सारे
आचार विचार बदल गए। और कुछ नए आचार विचार ने जन्म लिया, उसी बक्त ,उसी जगह ।
बस फिर क्या था , अब बो कहीं भी मिले, ना तो हम चूकते है और ना ही वो।
मुझे नहीं पता था , ये छोटी सी गलत-फहमियाँ मेरा सब कुछ बदल कर रख देंगी। जेसे एक
बूंद बूंद से घड़ा भरता है ठीक उसी प्रकार ये छोटी- छोटी सी गलत फहमियाँ मेरे लिए बड़ी सी
गलत फहमी ले कर आएगी और साथ ही ढेर सारी मुसीबते मुफ्त मे मिलेगी। मैंने बिलकुल
भी नहीं सोचा था। ………to be continued
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.mishra’s lover

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raaj rathore
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