Thursday, December 14, 2017
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sl.num.005 कि चाँद सा चेहरा है इसका या फिर ये खुद चाँद है..mishra’s lover

Sl.num.005

गलत फहमियों को एक-डेढ़ साल से ऊपर हो चुका था … और ये बस उसीनॉर्मल गति से
चल रही थी। क्यूंकी न तो बो मेरे कॉलेज मे ओर ना हीं कोचिंग मे साथ पढ़ती थी । जब भी कभी ऊपर
वाले की मर्जी होती तो कभी कभार बो हुमे एक दूसरे के आमने-सामने लाके खड़ा कर देता था ओर
उसके बाद एक और गलत फहमी बढ़ जाती थी।अब तक तो पूरी तरह से सब कुछ नॉर्मल ही था , कुछ
भी ऐसा होना शुरू नहीं हुआ था। जिसको हम थोड़ा भी अलग कह सके , या फिर यूं कहिए अभी इन
सब का सही समय नहीं आया था।जो भी गलत फहमियां हमारे बीच पल रही थी इस बात को भी सिर्फ
हम दोनों ही जानते थी। अभी तक कोई तीसरा नहीं जनता था ।क्यूंकी मैंने अभी तक किसी से इस् बात का
कोई जिक्र नहीं किया था । जब मैंने उसे पहली बार देखा और आज की तारीख के बीच का सफर डेढ़ साल
का था । ये जुलाई 2011 थी और अभी तक भी सब सामान्य ही था । न कुछ घटित हुआ था और ना हु
होने की कगार पर था। महिना बदला और इस् बदलते महीने के साथ हमारे बीच भी कुछ बदलने का भी समय
आया …..
आज फिर से, वो मुझे रास्ते मे दिखी, वो कॉलेज यूनिफ़ोर्म मे थी ,आसमानी सूट
ओर सफ़ेद सलवार । हो न हो ये यूनिफ़ोर्म बी.डी.एम. गर्ल्स कॉलेज की ही थी । साथ मे एक-दो ओर लड़कियां
भी थी , जिन्हे मे नहीं जानता था और नहीं ही मैंने उन्हे उसके साथ पहले कभी देखा था। अगर साथ मे कभी
उसके रही भी होगी तो मेरा कभी उन पर ध्यान नहीं गया होगा । रास्ता भी हर बार से बदला हुआ था,क्यूंकी
ये तहसील रोड न होके , नारायण रोड था । मे स्टेट बैंक की तरफ से आ रहा था और वो नारायण तिराहे से होकर
जा रही थी। चूंकि वो दो तीन लोग थे तो स्पष्ट: बातों मे लगे हुये थे । मे बिलकुल अकेला था, इसलिए मेरा ध्यान
उस पर पहले पहुंचा । और वो इस बात स बिलकुल बेखबर थी मुझे इससे थोड़ा मुनाफा ये हुआ ,मैंने थोड़ी देर
के लिए उसे टकटकी लगा के देख लिया । भरा- पूरा चेहरा , चेहरे पर कोई दाग भी नहीं , कलर एक दम सफ़ेद….
इतना सब कुछ निहार लेने के कुछ देर के बाद , उसका ध्यान मुझ पर गया।
उसकी नजरे सिर्फ पल भर के लिए मुझ पर रुकी, और तुरंत वापस चली गयी, किन्तु आश्चर्य के साथ एक पल मे
फिर वापस आयी । अबकी बार आने के बाद हटी नहीं बल्कि मुझ पर रुक गयी । उसकी इस हरकत से मुझे ऐसा
महसूस हुआ, जैसे उसने सोचा ही नहीं था की मे यहाँ हो सकता हु ।उसकी साथ वाली सहेलियाँ क्या बात कर रही
है शायद उसने ये सुनना भी बंद कर दिया था ।
आज जाते-जाते उसकी आँखों ने फिर से कहा-”बढ़ जाने दो गलत फहमियाँ”।
मैंने अपनी आँखों से स्पष्ट: देखा । थोड़ी और देर के लिए मुझे ऐसा लगा की अभी भी वो सामने ही है। लेकिन
सिर्फ ध्यान मे थी असलियत मे तो जा चुकी थी । हेर बार कि तरह फिर से कुछ पता ही नहीं चल रहा था, जो मुझे
लगा वही था या असलियत कुछ और थी। उसके बारे मे उसकी शक्ल ओर कॉलेज के अलावा मुझे कुछ पता ही नहीं
था। पर जो भी देखा या जो भी समझा । उसके चेहरे ओर उसके कलर को देखकर ,मैंने सिर्फ यही अंदाजा लगाया
की या तो ये पंजाबिन है या फिर मुस्लिम । समझ पाना मुसकिल था,
” कि चाँद सा चेहरा है इसका या फिर ये खुद चाँद है” । खैर जो भी था पर
ये तो साफ-साफ दिख रहा था कि मेरी परेशानियाँ मुझसे दूर नहीं थी ।बल्कि एकदम मेरे आस पास ही है बस मुझे उन्हे
आवाज देकर बुलाने कि देर है।………
to be continued….
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mishra’s lover

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raaj rathore
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