Thursday, December 14, 2017
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sl.num.002 दूसरी बार……mishra’s lover

Sl.num.2 dec 2011

परसों के बाद मुझे वो कल फिर से मिली थी और आज का देखते है
ऊपर वाले की क्या मर्जी है । अक्सर वो हुमे कोचिंग से आती हुयी
मिलती है न की जाते हुये , दरअसल जब हम अपनी कोचिंग से वापस
आ रहे होते है ऊपर वाले की रहमो- करम से तब वो कोचिंग जा रही
होती है । वैसे एक बात है उनकी निगाहे इधर उधर ज्यादा नही उठती
है । बस उतना ही देखती है जितना रास्ते पर चलने के लिए उसे जरूरत
होती है । बिल्कुल घोडा गाड़ी मे बंधे हुये उस मासूम से घोड़े की तरह ,
उस मासूम से घोड़े को सिर्फ उतना ही दिखता है जिससे उसे आगे का
रास्ता क्लियर दिखता रहे और लेफ्ट-राइट कुछ भी नहीं जिससे घोड़े का
ध्यान न भटके। वैसे मुझे उसकी किसी से तुलना करने की कोई जरूरत नही है बस एक
उदाहरण दिया है कान्सैप्ट क्लियर करने के लिए यही की शायद वो भी
सिर्फ स्ट्रेट देखती है।
उसके आजू बाजू क्या हो रहा है उन्हे कोई मतलब
नहीं,शायद कल भी वो यूं ही निकल गये थे।पर हाँ आज जब हम वापस
आ रह थे तो वो रोज की तरह कोचिंग जा रहे थे,लेकिन आज थोड़ा सीन
बदला।दरअसल हुआ कुछ यूं ,आज जब वो तहसील तिराये से कन्फ़ेक्सनरी
की तरफ आ रही थी । वो वैजल कन्फ़ेक्सनरी के थोड़े ही पीछे थी उसी
वक्त मे जस्ट शभू नगर की पहली गली से निकला ही था , पिछले दिनो
की तरह आज भी वो अट्ट्रक्टिव दिख रही थी तो स्पष्टतः मेरा ध्यान
घूम फिर कर उस पर चला ही गया तो मैंने फिर से नजर हटाना मुनासिब
न समझा। हमने अपनी नजरे उसपर गड़ाए रखी और वक्त के तगाजे का
एडवांटेज उठाए जा रहे थे । अब जैसे ही वो मुझे वैजल कन्फ़ेक्सनरी के
सामने क्रॉस करने ही वाली थी की अचानक से पता नहीं क्यू कमबख्त
मौसम को क्या सुझा।और उस कमबख्त मौसम ने कुछ करने की ठानी ।
और शायद इसीलिए उसकी एक कमजोर सी नजर मुझ पर पडी । अब
चूंकि मेरी नजरे पहले से ही उस पर जमी हुयी थी तो जैसे ही उनकी नजरे
हमारी तरफ बड़ी तो स्पष्टतः नजरे टकरायी। और हम तो पहले से ही
उन्ही पर टिके हुये थे और अब उन्होने हुमे देखा, या फिर हो सकता
है ये सिर्फ मेरे दिमाग की कल्पना हो।पर मेरे अंदर मानो उस एक पल के
लिए करेंट दौड़ गया हो । ऐसा लगा मेरी कोई चोरी पकड़ी गयी हो।ना जाने
क्यू मे अन्दर से पूरा डर गया।
उस एक पल के समय मे मेरे बदन के सारे
रौंगते खड़े हो गए। वैसे तो ये दिसम्बर का महीना था और वो भी उत्तर
प्रदेश जैसे स्टेट मे जहाँ इस समय सर्दी पूरा ज़ोर पकड़ चुकी होती है। पर
कुछ पल के लिए मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे ये जून का महीना हो और
मे तपती दोपहरी मे खड़ा हुआ हु । इससे पहले की हमारी नजरे एक
दूसरे से अच्छी तरह से भिडती मैंने अपनी नजरे उस पर से हटा ली और
में रास्ते पर देखने लगा हो सकता है उसे कुछ महसूस हुआ हो इसलिए
मैंने एक बार नजर हटाने के बाद दुबारा नहीं देखा या यूं कहिए दुबारा
देखने की हिम्मत नहीं हुयी क्यूंकी मेरा इरादा उन्हे कुछ जाताना नहीं था
ना हीं उन्हे सताना था। हम तो बस उस भंबरे की तरह है जो कभी इस
फूलपर तो कभी उस फूल पर पर हाँ निर्भर ये करता है की सबसे सुंदर
फूल कहाँ है।जिधर दिखा बस उधर ही रम लिए… to be continued
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mishra’s lover

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raaj rathore
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