Thursday, December 14, 2017
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sl.num.012 डेढ़-दो साल flash-back मे गया था mishra’s lover

sl॰ num.12

जिंदगी इन दिनो कुछ स्थिर सी हुयी। रोज का समय सारिणी भी लगभग

एक जैसी ही होती थी। क्यूंकी ट्यूसन पढ़ाने और पढ़ने मे ही पूरा दिन

फुर्र हो जाता ।दिवाली भी आने वाले थी । और दिवाली आने से पहले

ही एक और घटना मेरे साथ घटित हुयी, पर उसका मे यहाँ जिक्र करू

तो कोई मतलब नहीं बनता,क्यूंकी बो एक अलग ही पहलू की घटना

है । उसके बाद फिर दिवाली भी आयी….और फिर हर बार की तरह यूं

ही निकल गयी।

जैसा की मैंने जिस दिन से लिखना शुरू किया था । मे डेढ़-दो साल

flash-back मे गया था । अब वही लौट कर आ पहुंचा हूँ।

ये सर्दियों के ही दिन थे ।मेरा एक बैच सुबह 6 बजे था ,जिसे पढ़ा कर

मे अपना ट्यूसन पढ़ने जाता था । और जब मे जा रहा होता था । वही

… वो अंजान सा चेहरा …. बो ट्यूसन पढ़ कर वापस आ रही होती थी ।

मुझे नहीं पता वो कौन है और कहाँ से आती है और कहाँ चली जाती है

,हाँ शायद जब आती है तो जाती नहीं और जब चली जाती है तो उसके

बाद तक बनी रहती है, बिलकुल वेसे ही जैसे हवाओ मे खुसबू रह जाती

है कुछ पल के लिए , जब कोई मध्धम सी हवा किसी खूबसूरत फूलो

के बगीचो से होकर गुजरती है। फिर उसके बाद वो हवा जहां से गुजरती

है , उस हर एक आलम को सुहाना बनाते हुये आगे बढ़ती है जो भी

उसके रास्ते मे आता है । बिना कोई भेदभाव किए हुये की कौन मेरा

अपना है और कौन वेगाना। मेरी और उसकी उम्र मे कोई ज्यादा फर्क नहीं

लग रहा था । मे जिंदगी के उस हसीन लम्हे मे दाखिल हो चुका था और

वो दाखिल होने की कगार पर थी । वो उस दिन भी मासूम थी वो आज

भी उतनी ही मासूम है या हो सकता है ये सिर्फ मेरे दिमाग की कल्पना

हो । दरअसल बो खिलने वाले उन फूलों की तरह है जो कभी मुरझाते ही

नहीं और ना हीं जिनकी खुसबु फीकी पड़ती है ।उस दिन जब पहली बार

मैंने उसे देखा था शायद मेरी जिंदगी का अब तक का सबसे हसीन लम्हा

रहा होगा और शायद खुसनसीब भी।

कुछ समय के बाद ही 1 जनवरी 2012 भी आ गयी । जिसका स्वागत

पिछली साल की तरह ही मैंने अपनी karate team के साथ,पूरे

मजे से किया।

जनवरी पूरे निकल गयी थी । अभी ये फ़रवरी 2012 चल रही थी।…….

..to be continued

.

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