Thursday, December 14, 2017
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sl.num.033 मै उस एह्सास को मह्सूस करना चाहता था,जो उसके छूने के बाद उन किताबो मै आ गया था mishra’s lover

Sl.num.33. continue…

मै उस एह्सास को मह्सूस करना चाहता था,जो उसके छूने के बाद उन किताबो मै आ गया था|
किताबो को यथास्थान रखने के बाद जब मै वापस आया,मैने देखा,रिम्पी ने अपनी स्थिति,मेरे ओर लाइब्रेरी इन्चार्ज के बीच diagonal बना रखी थी ताकि वो किसी अनहोनी परिस्थिति को हेन्डल कर सके| क्योकि अगर लाइब्रेरी इन्चार्ज बिना permission के मुझे अन्दर देख लेते,तो मेरी वाट लगा देते|
आखिरकार मैने रिम्पी से कन्फर्मेशन माँगा,” किसी ने देखा तो नही”
“ना किसी ने नही देखा,सिवाय मेरे”,उसने हस्ते हुये कहा
हम दोनो लाइब्रेरी से बाहर निकले,लगभग पूरा कोलेज खाली हो चुका था| सिर्फ हम चार स्टुडेंट ,शायद ही कोइ टीचर अब तक कोलेज मे रुका था| कार्यालय तो अभी तक खुले थे| मैने कोलेज की मुख्य बिल्डिन्ग से बाहर निकलने के लिये जैसे ही लोहे के चेनल के बाहर कदम रखा,सबसे पहले मेरा ध्यान साइकिल स्टेन्ड की ओर ही गया| मिश्रा जी ओर उनकी सहेली अभी तक वहाँ रुके हुये थे,ओर ना जाने किस बात पर चर्चा चल रही थी,जिसकी वजह से हँसी उनके चेहरे पर अभी तक बसी हुयी थी| मैने आगे बढाया हुआ कदम वापस ले लिया व चेनल की आड मे हो गया


रिम्पी को मेरी ये हरकत बिल्कुल बर्दाश्त नही हुयी,वो खुद पहले पूरा बाहर निकला,फिर मुझे भी हाथ पकड कर खीचने लगा| मै बाहर जाना नही चाहता था,ओर वो मानने को तैयार नही था| हमारे बीच की खींचा तानी को जब मिश्रा जी व उनकी सहेली ने देखा तो बहुत ज्यादा खुश हुयी| फिर रिम्पी ने मुझे एक झुठा आश्वासन दिया,” अवे यार आ ना,मै भी तो तेरे साथ ही चल रहा हू|”
हम दोनो अब साइकिल स्टेंड के एकदम नजदीक थे,चूंकि मै उसके(रिम्पी) के एक कदम आगे चल रहा था,तो जैसे ही मैने पलट कर देखा,रिम्पी तो मेरे पीछे था ही नही,मेरे सीने मे एकदम धक्क सा हो गया| असल मे मुझे साइकिल स्टेंड की ओर बढते हुये देख वो दबे कदम के साथ मैन गेट की ओर बढ गया था| अब जब मैने उसकी ओर देखा,वही खडे रहते हुये पहले तो उसने खीसे नपोरी,फिर दोनो हाथो से अगूठा दिखाते हुये मुझे ढांढस बंधाते हुये,आगे जाने को कहा|
चूंकि अब मै इतनी आगे बढ चुका था कि पीछे लौटना भी मुमकिन ना था| सौभाग्यवश उस दिन साइकिल स्टेन्ड वाले भाईया भी वहाँ नही थे| अब जब मै अपनी साइकिल के पास पहुन्चता उससे पहले मिश्रा जी व उनकी सहेली एकदम शान्त हो गयी| मेरी साइकिल के एकदम बांयी तरफ मिश्रा जी की साइकिल पार्क थी,ओर मिश्रा जी की साइकिल से 3-4 कदम दूर उसकी सहेली की साइकिल पार्क थी | एक बात जो यहाँ गौर करने वाली थी,कि मै कोलेज की मुख्य बिल्डिन्ग से निकल कर साइकिल स्टेन्ड तक चलकर पहूंच गया था ,इस पूरे समय मे मिश्रा जी की साइकिल की चाबी उसके हाथ मे ही थी,लेकिन उसने एक भी बार साइकिल का ताला खोलने का प्रयत्न भी नही किया था|
पूरे साइकिल स्टेन्ड मे केवल हम तीन ही थे,माहौल एकदम शान्त था,मुझे सिर्फ एक ही आवाज सुनायी दे रही थी,बो आवाज थी मेरे दिल के धडकने की| मेरे पूरे शरीर मे रक्त संचालन प्रक्रिया वहुत तेजी से हो रही थी| मैने अपनी आँखो से देखा तो नही पर मेरा आभास है,खून मेरे चेहरे तक चढ गया था| जैसे जैसे मेरे ओर उसके बीच की दूरी कम हुयी,मेरे सोचने – समझने की शक्ती खत्म होती जा रही थी,पता नही मुझे क्या हो रहा था| मेरे कदम मेरी साइकिल के पास जाकर रुक गये,वो अपनी साइकिल के पास पहले से ही खडी थी,उस वक्त हम दोनो के बीच की दूरी ज्यादा से ज्यादा आधा मीटर रही होगी| थोडी सी हिम्मत जुटाकर मैने एक नजर उसके चेहरे पर डाली,वह अपना बैग साइकिल मे लगी टोकरी मे रखने लगी,लेकिन यकीनन उसको पूरा आभास था कि मेरी नजरे उस पर टिकी हुयी है| अब जैसे ही मैने अपनी नजरे उसके चेहरे से हटायी,मुझे भी आभास हुआ,इस बक्त उसकी नजरे मुझ पर ही थी|
मै जो भी प्रतिक्रियाये कर रहा था,सभी स्वचालित ही थी,मेरा इसमे कोइ हाथ नही था| उस समय मौसम जितना गर्म नही था,उससे कही ज्यादा पसीना मेरे चेहरे पर पर था| इसके विपरीत मैने जो देखा,वो एक लडकी होते हुये भी एकदम सामान्य अवस्था मे ही थी,हालांकि थोडी वहुत हडबडाहट उसकी प्रतिक्रियायो मे भी कभी कभार नजर आ रही थी| समय व्यतीत करने के लिये मैने अपनी पैंट की जेब मे साइकिल की चाबी ढूढना शुरु किया| इसी बीच मेरी नजरे उस पर 2-3 बार जा कर रुकी,उसने भी अपनी आँखो से जबाब दिया,पर उसके भी जुबान से एक शब्द ना निकला| कोइ भी कुछ नही बोलना चाहता था| उसकी सहेली हम दोनो से अलग चार्-पांच कदम दूर एकदम शान्त खडी थी|
अब मै अपनी जुबान से कुछ शब्द बोलना तो चाहता था,परन्तु दिमाग एकदम खाली था,इसलिये शब्द क्या होने चाहिये,मै समझ ही नही पा रहा था| मै पूरी तरह से कन्फ्यूज हो गया| आखिर शुरु कहाँ से करु,
हैलो, …….हाय्,
व्हाट इज योर नेम ?
मे आइ से समथिंग ?
मे आइ आस्क योर नेम ?
हाउ आर यू?
केन आइ हैव अ कन्वर्जेसन विथ यू?
क्या मै कुछ कहू?
क्या मै आपसे बात कर सकता हू?

ऐसे ढेर सारे सवाल मेरे सामने से ,पर चाहकर भी मेरे मुह से एक शब्द नही निकल रहा था|
इसके बावजूद ,रुकी तो वो भी ,ओर शायद मेरे मुह से कुछ सुनना भी चाह रही थी,परिस्थिति क अन्दाजा भी उसको था,किन्तु किसी की भी जुबान पहल नही करना चाहती थी|
अन्ततः मैने गेट के पीछे खडे रिम्पी की ओर देखा,वो पहले से ही स्थिति से पूरी तरह बाकिब था,उसने भी अपने हाथो व चेहरे के एक्स्प्रेसन से मुझे बोल के लिये इशारा किया,वो लगातात एक ही बात बोले जा रहा था…….बोल्……..बोल …..बोल …..कुछ तो बोल ..
To be continued…
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Mishra’s lover

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raaj rathore
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