Thursday, December 14, 2017
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Sl.num.20(1). वो मेरी मन्जिल तो नही थी..mishra’s lover

Sl.num.20(1) those days….

मैंने अपनी exam शीट के साथ साथ update रहने के लिए उसकी भी examsheet
collect कर ली । जिससे मे पता रख सकु की उसके exam किस किस तारीख को है. समय गुजर रहा था.आजकल मे भी अपनी पढायी मे काफी व्यस्त चल रह था.
उसके ओर मेरे ,दो – तीन से ज्यादा पेपर हो चुके थे ,मुझे अच्छी तरह याद है उसके पेपर दोपहर कि पाली मे हुआ करते थे ओर मेरे सुबह की पाली मे हुआ करते थे.हालान्कि मेरे एक्साम्स चल रहे थे फिर भी उन दिनो मुझे कराटे क्लास का इतना पागलपन था, कि मेने उन दिनो भी क्लास नही छोडी.प्रत्येक दिन जब भी पेपर के बीच गेप हुआ करता था,पुरा सामान उठा के मे मैदान मे पहुच जाया करता था.जाने अन्जाने मे एक दिन खुदा मुझ पर मेहरबान हुआ.मिश्रा जी के पेपर का छुटने का ओर हमारे क्लास जाने क समय मेच कर गया.उस दिन कि सबसे खास बात ये थी कि उस दिन बो युनीफोर्म मे थी,ओर उससे भी खास बात ये थी,कि वो एकदम नीले आसमान मे सुरज कि तरह चमक रही थी .आसमानी कलर भी कही ना कही उस पर फवता है. इस बात का पता मुझे उसी दिन चला.
उपर से उनकी निगाहे तो थी ही एकदम गजल सी खुबसुरत जो पढ ले उन्हे तो बस शायर बन जाये,हमने भी आव देखा ना ताव , उस लम्हे को खाली न जाने दिया…. पढ ली वो आँखे ओर बन गये शायर .
अश्चर्य कि बात एक ये भी थी की मेरा एक पेपर ओर उसका गणित का पेपर एक ही दिन पड गया था.
यहा एक बात हो सकता है थोडी हजम होने लायक ना हो पर सच है कि मे उसकी साइकिल भीड मे भी पहचान लिया करता था.चुन्कि उसके काँलेज का साइकिल स्टेन्ड बाहर ही था, तो जब मे कोलेज जा रहा था तो मेने उस साइकिल की भीड मे उसकी साइकिल पहचानने की कोशिश की,पर शायद मेरी नजरो से बच गयी.
वेसे भी अभी तो मुझे वापस भी लौट के आना था.क्युन्की मेरे पेपर मेरी स्पीड पर निर्भर करते थे,जबकी उसकी तो वोर्ड के पेपर थे.पूरे तीन घन्टे के बाद ही वो छूट सकती थी.हमने जल्दी से अपना पेपर निपटाया,ओर हाल से रफूचक्कर हो लिये.फिर से एक बार हमने अपनी नजरे साइकिल पर गडायी,पर शायद हम एक बार फिर नकामयाव हो गये.या फिर यु कह लिजिये हमारे हाथ क्या लगा सिर्फ बाबा जी का ठुल्लु.
ये भी हो सकता है वो पैदल ही आयी होगी,या फिर कोई ओर तरीका का इस्तेमाल किया हो .इन सब के बावजूद एक ओर बजह हो सकती थी ओर वो थी ”कोलेज आयी ही न हो” लेकिन मेने इस विचार का गला तुरन्त ही घोट दिया..
उसके अगले गणित के पेपर के दिन भी मेरे साथ ऐसा ही हुआ.फिर शायद मेरा दिमाग चकरा गया.
मैने थोडा सा दिमाग दौडाया,
जिस दिन जीवविग्यान का पेपर था, उस दिन थोडी-सी जान्च पडताल करने पर ग्यात हुआ कि वो गणित की विधार्थी नही थी.
अब चून्कि मे गणित का विधार्थी था इसलिये शायद मेरे दिमाग ने कभी परिकल्पना ही नही कि गणित के अलावा भी कुछ ओर बिषय भी होते है ओर लोग उन्हे भी पढते है.
फलतः यहां मेरी परिकल्पना गलत साबित हुयी या इसे दुसरे नजरिये से देखने पर ये कहा जा सकता है.
“उसके बारे मे थोडा वहुत ओर जान गया था.”
धीरे धीरे ही सही पर कोहरा साफ हो रहा था.सोचने वाली बात ये भी थी, कितने लम्बे समय से मैने किसी मिथ्या को सच माना हुआ था.
वो मेरी मन्जिल तो नही थी,पर फिर भी ना जाने क्यु उससे मिलने के बाद मेरे पैर थम से जाते थे.

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raaj rathore
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