Thursday, December 14, 2017
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sl.num.26 मै तुम सब का रखवाला बनूगा… mishra’s lover

Sl.num.26. 13 aug 2012

अगले महिने मेरा एक competitive examथा,जिसका मुझे अभी तक call letter भी नही मिला था | उन दिनो उसी की तैयारी चल रही थी | बारहवी के तुरन्त बाद ही मैने ठानी थी, स्नातक खत्म होने तक हर हाल मे नौकरी मिल जानी चाहिये| इन सब के बाबजूद मेरे कुछ पहले से चुने हुये,fields थे,उन fields उन departments मे ही मुझे जाना था|कुछ fields ऐसे भी थे,जिनके बारे मे मैने कभी नही सोचा,ओर इसीलिये कभी भी उन fields मे जाने के लिये कोशिश भी नही की|जैसा कि जब मे बारहवी मे पढता था,मेरे साथ के लोग हमेशा बाते किया करते थे कि उन्हे डाँक्टर ,इन्जीनियर बनना है|I.I.T. ,A.I.E.E.E ,N.I.T. इन सब के नीचे तो कभी बात ही नही हुआ करती थी.कुल मिलाकर ज्यादामात्रा मे b.tech. उनके लिये ultimate goal था| मे उन सब के बीच एकदम शान्त बैठा करता था,क्युन्की मेरा तो ऐसा कोइ goal ही नही था,ओर शायद ना ही ये मेरा future बनाने वाले fields थे|लेकिन फिर भी अगर कभी-कभार मेरे बारे मे पूछा करते थे तो मे सिम्पली बोल दिया करता था,”मै तुम सब का रखवाला बनूगा.”


कुछ fields ऐसे भी थे जिनमे मेरी थोडी बहुत लग्न थी|उनमे से एक “टीचिन्ग ” थी|अपने इसी शौक को पूरा करने के लिये मे maths ओर science के batches पढाया करता था|मैने सोच रखा था अगर कुछ नही बन पाया तो एक अध्यापक ही बन जाऊगा |
फिलहाल मै जिस नौकरी को पाने की कोशिश कर रहा था वो मेरे चुने हुये प्रिय fields मे से एक थी|इसलिये मे तहे दिल से चाहता था,कि मै इस exam को हर कीमत पर पास करु|इस नौकरी को पाने की दो खास बजह थी,
पहली-मेरी खुद की इच्छा व satisfaction
दूसरी- मेरे पापा चाहते थे कि मे सिर्फ एक सरकारी नौकरी करु|
चाहे वो किसी भी क्लास की हो,भले ही -“चपरासी”
हो ना हो, मै अपने पापा की इच्छा की काफी कद्र करता था, व उस पर खरा उतरना चाहता था|आखिर उनका अच्छा बेटा जो था|कही ना कही ये उनका खुद का दर्द ,कुछ इच्छाये ओर कुछ उम्मीदे थी जो उन्हे मुझसे थी| वो अपने जमाने के अच्छे-खासे पढे लिखे व होनहार विध्यार्थी रहे,किन्तु बद्किस्मती व हल्की फुल्की अड्चनो के चलते,अच्छी- खासी सरकारी नौकरी उनके हाथ से फिसल गयी| इसीलिये बो भी तहे दिल से चाहते थे कि मै सिर्फ एक सरकारी कर्मचारी ही बनू| मेरे लिये उन्होने बस इतना छोटा सा सपना सजा रखा था| अब उनकी इस छोटी सी इच्छा को पूरा करना मेरा धर्म बन गया था| हालन्की उन्होने मुझ पर इस बात को लेकर कभी दबाब नही बनाया,सिर्फ अपनी इच्छा मेरे सामने रखा करते थे| बाकी हमारी माताजी के लिये मेरा हर निर्णय ,हर सपना हर इच्छा उनकी खुद की थी वो मेरे ही निर्णय व सपने से खुश थी|
Centre for ambition की क्लासेज मे सुबह ही attend कर लिया करता था |व कुछ क्लास दोपहर मे कभी- कभार ले लिया करता था |सुबह की क्लासेज लगभग 11:30 खत्म हो जाया करती थी/ उसके study व preparation के लिये मैने एक बहुत ही खास जगह चुनी,जहाँ मुझे उचित स्थान व मन्चाही शान्ती,सुकुन बडे ही आसानी से उपलब्ध हो जाया करती थी|सुबह 11:30 से दोपहर 01:30 तक का समय अब मे कोलेज library मे utilize करने लगा|
शुरुआत के एक दो दिन तो मे किसी भी सीट पर बैठा,लेकिन. बाद मे अपने convenience के आधार पर मैने एक सीट fix कर ली| लाइब्रेरी के मुख्य द्वार पर लकडी के दरवाजे की जगह्,लोहे का chennal लगा हुआ था| मैने उसके ठीक सामने वाली कुर्सी अपने लिये चुन ली उसकी एक बजह ये थी,वहाँ से बाहर का पूरा द्रश्य साफ्-साफ दिखायी देता था| चेनल के ठीक सामने एक व्याख्यान क्लास था| मुझे ठीक से याद नही है पर शायद उस व्याख्यान क्लास का नम्बर 7 था उस ब्याख्यान क्लास के द्वार के पास व व्याख्यान क्लास की खिडकी से अन्दर का थोडा द्रश्य मुझे उस कुर्सी पर बैठे -2 ही दिख जाया करता था | इस सब के परे उस कुर्सी पर बैठे -2 मुझे अच्छी खासी रोशनी व हवा बडे ही आसानी से मिल जाया करती थी|
उस दिन भी मे अपना library session थोडा जल्दी खत्म करके लगभग 1 बजे के पहले वापस घर लौट रहा था,मिश्राजी अपनी एक सहेली के साथ्,state bank के आगे जो टाइपिस्ट क्रोसिन्ग है,मुझे वहाँ मिली उस दिन उसने pure white top व dark blue jeans पहना हुआ था.| Top मे हल्की फुल्की डिजाइन थी व जीन्स एकदम plan था | उन कपडो मे वो काफी फब रही थी या यु कह लीजिये वो कपडे उस पर काफी फब रहे थे| उन दिनो की fashion के हिसाब से jeans pencil डिजाइन मे था| बालो को उसने बान्ध कर चोटी बनायी हुयी थी | सिल्वर कलर की घडी व काले कलर के लेडीज sandal पहने हुये थी|
उस दिन भी बाकी सब पहले जैसा ही था,सिवाय इसके कि उसकी सहेली उससे कुछ कदम पीछे चल रही थी,यहाँ मेरा अभिप्राय यह नही है कि वो दोनो पैदल थी,वो दोनो साइकिल से ही जा रही थी| किन्तु मैने जब उसकी सहेली को cross किया| मुझे नही पता क्या,कैसे लेकिन एकदम अलग तरीके से उसकी सहेली ने react किया| मानो ऐसा कुछ ,जैसे मेरे बारे मे वहुत कुछ जानती हो,या फिर कुछ दिनो मे वहुत कुछ जान गयी हो, अच्छी तरह पहचानती हो| उस बक्त जैसे उसने अपने आप को मेरे सामने पेश किया,वो अन्दाज अलग थ|
उस अन्दाज मे शामिल था,
1.हड्वडाहट्,
2.सब जानकर अन्जान बने रहने की अदा,
3.ओर एक इशारा जो मिश्राजी की तरफ था.


इन सब को मैने एक नजर मे ही भाँप लिया|मे तो एक दम जैसे घवरा ही गया|इस सब ने मुझे सन्दिग्घ अवस्था मे डाल दिया|इस सन्दिग्घ अवस्था ने मुझे एक बजह दी,रात भर जागने की……………………..
फिर हम चले गये अपने रास्ते ,वो अपने रास्ते|…to be continued.
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.mishra’s lover

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raaj rathore
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