Thursday, December 14, 2017
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sl.num.28 भगवान के यहा रिश्वत चलती होती, तो मै अपनी साँसे गिरवी रखकर हमेशा के लिये उसका मुस्कुराता चेहरा माँग लाता …mishra’s lover

Sl.num.28. 18 aug2012

उनके माथे की उभरती हुयी लकीरो मे प्रश्नवाचक चिन्ह साफ झलक रहे थे.लेकिन उन प्रश्नो का जबाब देना मेरे लिये compulsary तो नही था,ये सोचते हुये मैने वहाँ से चुपचाप निकलना उचित समझा|

एक दिन बाद ……
(“उपर भगवान के यहा रिश्वत चलती होती, तो मै अपनी साँसे गिरवी रखकर शायद उसका हमेशा के लिये मुस्कुराता चेहरा माँग लाता”.)
कल यानी 17 /08/2012 को काँलेज बन्द था|


आज का दिन भी लगभग बाकी पिछ्ले दिनो जितना ही हसीन था,वही सब कोचिन्ग attend करना,self study in library,फिर उसके क्लास मे चले जाने के 10-15 मिनट बाद मेरा लाइब्रेरी से चले जाना|
वो,मिश्राजी,उस दिन भी अपने रोज के समय के अनुसार ही आयी, लेकिन जब वो आयी तब तक व्याख्यान हाँल खाली नही हुआ था,पहले से चल रही क्लास अभी तक छूटा नही था| इसलिये सारी लडकिया व्याख्यान हाँल के अगले द्वार के पास आकर ही रुक रही थी| वो भी अपनी सहेली ले साथ आकर वही खडी हो गयी | मे,रोज की तरह पहले से ही लाइब्रेरी मे उपस्थित था,वेसे भी जब उसके आने का समय होता था मेरी पढायी तब तक खत्म हो जाया करती थी| बचा रह जाता तो सिर्फ दिखावा जिसके लिये मे किताबे यू ही खोल कर रख लिया करता था|ताकि लाइब्रेरी के जो कर्ता- धर्ता है ,उन्हे ये ना लगे कि मे फालतु बैठा हु|
वो सब आपस मे बात करने मे व्यस्त थी,
हालान्की व्यस्त तो मे भी था उसको देखने ( ताडने ) मे.फिर भी ना जाने क्यू आपस मे बात चीत करते हुये उसकी अटपटी सी निगाहे अचानक इधर – उधर घूम जाया करती थी| बात करते हुये ,सर को थोडा नीचे झुकाये रखने की आदत उसकी अब तक गयी नही थी| बातो को सुनने व बोलने के बीच्-2 मे जब वो मुस्कुराया करती थी| उससे ज्यादा खुबसुरत वो कभी नही लग सकती| ये लम्हे मेरे लिये बहुत हसीन हुआ करते थे,क्यून्की मे उसको बिना किसी अडचन के ,बिना पल झपकाये हुये,टकटकी लगाकर देख सकता था| इस स्थिति मे ,मै बडे ही आराम से बैठा हुआ था| मैने अपने दोनो हाथो की कोहनियो को सामने मेज पर रखी हुयी किताब पर रखा हुआ था, व दोनो हाथो की हथेलियो को एक साथ मिलाकर अपनी ठोडी को उस पर टिकाया हुआ था| उस वख्त मै चाहता था कि ‘काश ‘थोडी देर के लिये ये वख्त थम जाये|किन्तु समस्या ये थी कि मेरे चाहने ना चाहने से भला क्या होने वाला था| आखिर मै एक तुच्छ मानव ही तो हु| जिसके वश मे खुद की इच्छाये नही थी भला समय कहा थमने वाला था| हाँ इतना जरूर था,अगर
“उपर भगवान के यहा रिश्वत चलती होती, तो मै अपनी साँसे गिरवी रखकर शायद उसका हमेशा के लिये मुस्कुराता चेहरा माँग लाता”|
आखिरकार मेरे इस सुन्दर से सपने का अन्त हुआ| हुआ यूँ पहले से चल रही क्लास छूट गयी थी|इसलिये व्याख्यान हाँल के खाली होते ही,वो ,व उसकी सहेली अन्दर जाने लगी|हो ना हो उस दिन उपरवाला( भगवान ) मुझ पर मेहरवान था,वो क्लास मे खिडकी के पास वाली सीट पर बैठी थी,इधर मेरी कुर्सी की स्थिति कुछ युँ थी कि मै अपनी जगह से बिना एक इन्च हिले डुले,उसे अपने अपनी आँखो के सामने देख रहा था| ओर इसी लालच मे, मै रोजाना के हिसाब से 10-15 मिनट ज्यादा बैठा रहा| फिर जब उनकी क्लास मे अध्यापक आकर उनको पढाने लगे,तो मै लाइब्रेरी छोड के चला आया|
जब मे साइकिल स्टेन्ड पहुन्चा,आस – पास नजर दोडाने पर उसकी साइकिल नजर नही आयी,तो मेरी समझ मे सबकुछ आ गया| मैने एकाएक अपनी साइकिल की तरफ देखा,आज का नजारा भी कल जैसा ही था,बस फर्क सिर्फ इतना था मिश्रा जी की साइकिल मेरी साइकिल के वाँयी तरफ ना होकर दाँयी तरफ पार्क थी व उसकी सहेली की साइकिल उसकी साइकिल के दाँयी तरफ पार्क थी|
कुछ देर तक यूँ ही खडे रहने के बाद मैने फिर अपना high picture quality वाला nokia c-1 मोबाइल निकाला,लगातार तीन – चार फोटो क्लिक की,जिनमे से एक दो फोटो सही भी नही आयी थी| दर असल फोटो खिचते समय दो बाते मेरे दिमाग मे आया करती थी|
पहली– मै अपने खुशी व शुकून के लिये क्लिक करता था|
दूसरा- कभी भविश्य मे मिश्राजी या मेरे दोस्तो को मेरी इन बचकानी बातो का यकीने दिलाने के लिये मे उनके सामने पेश कर सकु ओर उन्हे यकीन दिला सकु|
आज फिर जैसे ही मै पिक्चर क्लिक करने के बाद मै पीछे मुडा,साइकिल स्टेन्ड वाले भैया,स्टेन्ड के एक कोने मे खडे ,सरसरी नजरो से सबकुछ देख ही रहे थे| पिछ्ले दिन की तरह आज भी उनके चेहरे पर कई सारे प्रश्नवाचक चिन्ह थे| आज भी मैने उसके किसी भी सवाल का जबाब देना जायज ना समझा|लेकिन फिर जब मे जाने लगा,मैने पीछे मुडकर उनकी तरफ देखा,ओर जितनी अच्छी हो सकती थी एक हल्की सी स्माइल दी|हालान्की उनके चेहरे मे हाव भाव बिल्कुल भी ना बदले| मुझे तो लगा जैसे ये सब देख कर वो अचेत अवस्था मे आ गये थे | हो सकता है उनके मन मे कुछ सवाल ऐसे भी उठ रहे होन्गे जिनके तहत उन्हे लगता होगा ,” कही ये लडका दिमाग से हिला- डुला तो नही है,या फिर कोइ मानसिक बिमारी?” वेसे भी इन सब सवालो का उठना जायज था आखिर मै उन दिनो काम ही ऐसे कर रहा था to be continued……..
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.mishra’s lover

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raaj rathore
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