Thursday, December 14, 2017
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sl.num.29(1/2) मैने दोस्ती व भाईचारे के रिश्ते की नीव डाली थी mishra’s lover

Sl.num 29(1) 25 aug 2012

हो सकता है उनके मन मे कुछ सवाल ऐसे भी उठ रहे होन्गे जिनके तहत उन्हे लगता होगा ,” कही ये लडका दिमाग से हिला- डुला तो नही है,या फिर कोइ मानसिक बिमारी?” वेसे भी उनके दिमाग मे इन सब सवालो का उठना जायज था आखिर मै उन दिनो काम ही ऐसे कर रहा था……continue
मिश्राजी को हमारे काँलेज मे आये हुये लग्भग 20 दिन से ज्यादा हो चुके थे|मुझे तो इस बारे मे पहले ही दिन से पता था|परन्तु किसी ओर के साथ इस बात क! अभी कोइ जिक्र नही था यहाँ तक कि रिम्पी को भी नही,उसे बिल्कुल कोइ खबर भी नही थी|वेसे उसको ना बताने कि कोइ खास बजह भी नही थी|मैने सोचा ,”बता…..दुन्गा”|
लेकिन अब शायद बताने का सही समय था|फिर जब मैने उसको बताया,” क्या तुझे पता है? मिश्राजी अपने कोलेज मे ही पढ रहे है.”|
इतना सुनने के बाद उसका चेहरा देखने लायक था,मुझे नही पता ये आश्चर्य था या गम ?दर असल उसे लगा कि मै मजाक कर रहा हु,या फिर से घुमाने कि कोशिह कर रहा हु| फिर बडी जद्दोब्जहद के बाद मैने किसी तरह उसको यकीन दिलाया,साथ ही साथ उसे अपने साथ लाइब्रेरी मे आने का भी प्रस्ताव दिया|


वेसे भी हम दोनो ने एक ही exam के लिये apply किया हुआ था|मेरे साथ छोटी सी अड्चन ये थी ,कि उसे काँल लेटर मिल चुका था,
मुझे तो अभी तक सन्देह था कि मेरा काँल लेटर आयेगा भी या नही|क्युन्की जिस लिफाफे मे काँल लेटर वापस आता है मै उस लिफाफे पर अपने घर का पता लिखना ही भुल गया था|अब अगर मेरे पास कुछ बचा हुआ था ,तो बस एक छोटी सी उम्मीद ,” मुझे काँल लेटर मिलेगा.”
काँल लेटर ना मिलने वाली बात व ना मिलने की बजह दोनो मैने भैया को बता रखी थी.इस बात पर भैया का सीधा सा जबाब था,”don’t worry ,hope for the best and without fail keep ur preparation continue.”

उस दिन , रिम्पी भी मेरे साथ आया|हालान्की उस दिन भी वही सब हुआ| मिश्रा जी आये,हमारा लाइब्रेरी मे होना,उसके बाद जब वो क्लास ने चली गयी| जब हम कुछ देर के लिये लाइब्रेरी मे रुके तो मैने रिम्पी को उसके , काँलेज मे पहले दिन आने से लेकर उस दिन तक की पूरी बात बतायी|मैने उसको साइकिल स्टेन्ड वाला किस्सा भी सुनाया व आश्वासन भी दिया,”हो सकता है आज तुझे साइकिल स्टेन्ड मे आँखो देखे हाल से भी बाकिव कराउँगा|”
फिर जब हम लाइब्रेरी से pack up करने के बाद जब साइकिल स्टेन्ड पहुन्चे,पहले तो मुझे लग रहा था,” हो सकता आज scene बदला हुआ होगा|”
लेकिन जब actual मे हम दोनो पहुन्चे|मैने अँगुली से ईशारा करते हुये,रिम्पी को हमारी साइकिल्स की ओर इन्गित किया ओर कहा,”शायद तुझे मेरी बात पर विश्वास नही हो रहा होगा,तू खुद देख ले भाई ,जिस manner मे ये cycles पार्क है ये आज तीसरी बार हुआ है|”
इसके साथ ही मैने उसके सामने एक सवाल रखा ,”तुझे क्या लगता है? ये सब अनजाने मे हो सकता है वो भी लगातार ?? कितनी अजीब बात है ना इतने बडे साइकिल स्टेन्ड मे सिर्फ ईतनी जगह पार्किन्ग के लियी खाली मिलती है|हा हा हा हा
इतना बोल कर मे हँस पडा |
मुझे भी पता था आखिर वो क्या बोल सकता था,फिर जब वो कुछ नही बोला ,मैने सिर्फ अपनी भोहे के इसारे से उसे प्रेरित किया ओर उससे जबाब माँगा|
बो भी कन्धे उचकाते हुये , उसके मुह से कुछ शब्द निकले,” no comments ”
हर बार की तरह मैने इस बार भी फोटो क्लिक की ओर साथ मे स्टेन्ड वाले भैया को एक ,मुझसे जितनी अच्छी हो सकती थी,स्माईल दी| सबसे खतरनाक बात उस दिन. की ये थी भैया ने मेरी मुस्कुराहत का जबाब मुस्कुरा कर ही दिया|
मैने अपनी साइकिल की की चाबी रिम्पी की तरफ फेन्कते हुये ,उसे ताला खोलने का इशारा किया| पेन्ट की जेब मे हाथ दालने पर मुझे एह्सास हुआ | मेरी पेन्ट की दाँयी जेब मे alpenliebe toffee पडी हुयी थी| मै चल कर भैया के पास पहुन्चा,मैने एक टाँफी उनको आँफर की,पहले तो वो थोडे हिचकिचाये,किन्तु जब मैने उन्हे थोडा insist किया,तो उन्होने thank you बोल कर कुबुल कर ली| दर असल वो टाँफी मैने उनको रिश्वत के तौर पर नही दी थी,बल्कि मैने दोस्ती व भाईचारे के रिश्ते की नीव डाली थी| इसलिये ये टाँफी नीव की पहली ईट थी|
फिर जब हम काँलेज से बाहर निकल आये| रिम्पी काँलेज की सामने वाली xerox की दुकान पर रुक गया| किसी बुक के कुछ पन्नो की उसे xerox कराने थी| मेरी गणना के हिसाब से उसे 5-10 मिनट तो आराम से लगने वाले थे तो मैने उससे कहा,”तू xerox करा कर आ ,मै तुझे पाली चौराहे पर मिलता हु,ओर हाँ मुझे कोई जल्दी नही है|”
मैने चौराहे पर पहुन्च कर साइड मे साईकिल लगायी ही थी कि तभी मेरी आँखो के सामने एक घटना घटित हुयी|
दर असल हुआ कुछ यूँ था,स्टेशन की ओर से आ रहा एक साईकिल सवार जैसे ही चौराहे पर पहुन्चा| वो सीधा जाना चाहता था,इसलिये उसने अपनी साईकिल की गति बरकरार रखी ओर चौराहा क्राँस करने लगा|
ठीक उसी समय्,जिस रास्ते को follow करके मै वहाँ पहून्चा था,उसी रास्ते का अनुसरण करते हुये,एक मोटरसाईकिल सवार युवक चला आ रहा था,मोटरसाइकिल सवार को भी अपनी दिशा मे सीधा ही जाना था,इसलिये मोटर्साइकिल सवार भी चौराहा क्राँस करने लगा,पर शायद वो नौजवान कुछ ज्यादा जल्दी मे था,इसीलिये उसने अपनी मोटर साइकिल की गति को कम करना मुनासिब ना समझा,या हो सकता है,चून्कि वो नवयुवक था,रगो मे गर्म खून दौड रहा था,तो ये सब करना उसे लज्जित कर सकता था|to be continued….
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Mishra’s lover

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raaj rathore
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