Thursday, December 14, 2017
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Sl.num.24 अनुभव से वो एक कुशल पाठक थी mishra’s lover

Sl.num.24. 07aug2012

Center for ambition एक कोचिन्ग है जो मेरे ही शहर मे थी,मैने पिछ्ले एक साल से join कर रखी थी.उस कोचिन्ग के शर्ते कुछ ऐसी थी कि आप एक बार फीस fill up करने के बाद selection न होने तक कोचिन्ग continue कर सकते है. मेरा i.b.p.s. लिखित पेपर पास हो चुका था पर interview तो अभी बाकी था, इसलिये मैने कोचिन्ग अभी तक continue की हुयी थी.
उस दिन मैने अपना batch सुबह ही attend कर रखा था लेकिन दोपहर मे कोइ g.s.k. के teacher क्लास लेने वाले थे, तो मैने उस क्लास को attend करने का मन बनाया हुआ था.
मुझे कोलेज मे भी कुछ काम था इसीलिये मे थोडा पहले घर से निकला ताकि पर्याप्त समय के रहते अपना काम भी कर सकु.
कोलेज के बाहर पहुन्चने के बाद मैने कुछ भीड को बाहर निकलते हुये देखा.सभी student ही थे, मेरे guess के हिसाब से new comers की क्लासेस शुरु हो गयी थी.
चुँकी मे साइकिल पर था इसलिये मे भीड मे दाखिल नही कर सकता था, मैने gate के बगल मे साइकिल रोक कर भीड के खत्म होने का इन्तजार करने लगा. मुस्किल से 5-7 सेकन्ड मे सारे लोग निकल गये. मे अपनी साइकिल से बिना उतरे हुये सीधे अन्दर चला गया. वेसे मे चाहता तो बाहर से सीधे साइकिल स्टेन्ड जा सकता था, किन्तु मुझे कुछ ज्यादा समय नही लगने वाला था. इसलिये मैने साइकिल को अन्दर पार्क करना ज्यादा उचित समझा. कोलेज के अन्दर के माहोल को देख कर लग रहा था कि कोलेज लगभग पूरा खाली हो चुका था. साइकिल स्टेन्ड की अन्दर से कोइ अलग से दीवार नही है इसलिये सबकुछ साफ-साफ दिखता है. सिर्फ डिवाइड करने के लिये कुछ पाइप लगा रखे है. पाइप्स भी इतनी उँचाई के है जिन्हे आसानी से जम्प किया जा सकता है. मैने देखा साइकिल स्टेन्ड मे कुछ 2-3 लडके ओर 3-4 लड्किया ही बची हुयी है, मैने साइकिल जाकर एकदम साइकिल स्टेन्ड के पास जाकर रोकी. मेरी साइकिल के ठीक सामने कोई ledies साइकिल भी थी.फर्क सिर्फ इतना था मेरी साइकिल स्टेन्ड के बाहर थी ओर वो अन्दर्,एक पल को मुझे लगा कि उस साइकिल का ताला खोलने वाला शख्स मिश्रा जी हो , पर मेरा वहम हो सकता है.
दुसरी बात अगला बन्दा मेरे से opposite direction मे देख रहा था तो confirm भी नही कर पाया.वेसे मेरी साइकिल रुक चुकी थी लेकिन मे अभी तक साइकिल से नीचे नही उतरा था.
friction of second के बाद जब वो लड्की मेरी तरफ मुडी. तब जा के मेरा सन्देह खत्म हुआ ,वो मिश्रा ही थी . ….नेहा मिश्रा
उसको मे वहाँ देखकर मे थोडा आश्चर्यचकित हुआ,पर मुझसे ज्यादा तो वो आश्चर्यचकित लग रही थी.अचानक से उसके चेहरे के हाव-भाव मुझे वहाँ देखकर बदल गये.मैने उसके माथे पर पडी लकीरो को भी देखा.मेरे आश्चर्यचकित होने की बजह तो साफ थी ,वो यहाँ कब ओर कैसे आयी???
खैर मुझे तो पहले से भी थोडा वहुत अन्दाजा था पर वो तो पूरी तरह अन्जान थी.
उस वख्त हम दोनो के बीच की दूरी 2 से 2.5 मीटर रही होगी.हमारी साइकिल भी आमने – सामने थी ओर उनके बीच की दूरी ज्यादा से ज्यादा 1 मीटर रही होगी. हमारी स्थिती कुछ युँ थी… उसका चेहरा पूरी तरह मेरी तरफ था, उसका शरीर उसके चेहरे से 90 डिग्री का कोण बना रहा था, उसका दाहिना हाथ उसकी साइकिल की सीट पर था,वायाँ हाथ मे किताबो से आधा भरा स्कूल बेग था. बेग को रखने के लिये, उसने बायाँ हाथ आगे बढाया ओर बेग को साइकिल मे लगी टोकरी मे रख दिया.उसके बाद वो कुछ समय के लिये उसी अवस्था मे स्थगित हो गयी. फिर उसने उस अवस्था को थोडी देर के लिये नही बदला.अभी भी उसका बायाँ हाथ टोकरी मे था,दाहिना हाथ सीट पर ओर साइकिल अभी भी स्टेन्ड के आधार पर टिकी हुयी थी.
दुसरी तरफ्, मे अभी तक साइकिल पर ही टँगा हुआ था, हालान्की मेरी साइकिल विराम अवस्था मे कब से आ चुकी थी.मेरे पैर के दोनो जूतो का अगला भाग जमीन पर टिके हुये थे.मैने अपने दोनो हाथो से ब्रेको को मजबूती से जकडा हुआ था. मेरा बेग मेरी पीथ पर था.चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट थी जो मेरे ना चाहने पर भी आ गयी थी. पिछ्ले कुछ समय से मे भी लगातार उसी अवस्था मे स्थगित था.
हमेशा की तरह इस बार भी मेरी नजरे उसकी आँखो पर जाकर टिक गयी. “जब किसी गोताखोर को पानी मे डुबकी लगाने के बाद मोती हाथ लगता है, तो उसकी रुकी हुयी साँसो मे जान आ जाती है ओर अपार खुशी का अनुभव होता है”. मुझे उस सुकून का अनुभव अभी हो रहा था. कुछ पल के लिये मेरी खोज खत्म सी हो गयी ओर साँसो की रफ्तार भी बढ गयी थी.
मेरे मन मे ढेर सारे सवाल उमड रहे थे. सारे के सारे सवाल मेरी जबान पर आने के लिये उतावले थे. किन्तु परिस्थितियो को ध्यान मे रखते हुये,मे अपने सवालो को जवान पर तो नही ला सका,लेकिन अपने सारे सवालो को मे अपने चेहरे के हाव-भाव मे आने से ना रोक पाया.
उस समय हुये अनुभव से मुझे पता चला कि वो एक कुशल पाठक थी, मेरे चेहरे पर उमड रहे हर एक सवाल को उसने पढा. साथ ही साथ हर एक सवाल का जबाब भी दिया, उसका जबाब देने क अन्दाज तारीफ – ए – लायक था. सम्भवत सवाल तो उसके भी दिमाग मे उमड रहे होन्गे. मुझे नही मलूम, मे कोई जबाब दे पाया या नही .
” मे लगातार अपने चेहरे से कई सवाल किये जा रहा था ओर वो एक अनुभवी teacher की तरह अपनी आँखो से सारे के सारे सवालो के जबाब दिये जा रही थी.”
हमने जो शान्ती का माहोल बनाया हुआ था, उसको पीछे से आयी कोलाहल से परिपूर्ण एक वाक्य ने एक झटके मे तोड दिया,
किसी ने उससे कहा ,” ओये चलेगी नही क्या????”
उसके साथ की, कुछ लड्किया बाहर उसका इन्तजार कर रही थी. जिनमे से एक उसकी खास सहेली भी थी, जिसको मे पहचानता था. इससे पहले कोइ फिर से उसको बुलाये, वो जाने लगी. लेकिन मैने अपनी अवस्था नही बदली जब तक कि वो एकदम बाहर नही निकल गयी.
मेरी टूटी- फुटी गणना के हिसाव से, मैने उसको या उसने मुझको पूरे 3 महिने 20 दिन ओर लगभग 22 घन्टे बाद एक दुसरे के आमने सामने पाया था. उसके चले जाने के बाद जब मे नोर्मल हुआ .फिर मैने अपने वो काम पूरे किये जिसके लिये मे घर से निकला था……to be continued……..
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Mishra’s lover

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raaj rathore
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