Thursday, December 14, 2017
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sl.num.001 जब मैंने उसे पहली बार देखा था …..mishra’s lover

Sl.num.001 dec 2011

वेसे रोज रोज नहीं मिलती वो मुझे ,लेकिन हाँ महीनो और सफतों के
हिसाब से मिलती जरुर है ,कभी-कभार, आते जाते रास्ते मे कहीं।
मुझे नहीं पता वो कौन है और कहाँ से आती है और कहाँ चली जाती है
,हाँ शायद जब आती है तो जाती नहीं और जब चली जाती है तो उसके
बाद तक बनी रहती है, बिलकुल वेसे ही जैसे हवाओ मे खुसबू रह जाती
है कुछ पल के लिए , जब कोई मध्धम सी हवा किसी खूबसूरत फूलो
के बगीचो से होकर गुजरती है। फिर उसके बाद वो हवा जहां से गुजरती
है , उस हर एक आलम को सुहाना बनाते हुये आगे बढ़ती है जो भी
उसके रास्ते मे आता है । बिना कोई भेदभाव किए हुये की कौन मेरा
अपना है और कौन वेगाना।
आज से लगभग दो साल पहले देखा था मैंने
उसे, पहली बार ,पहली दफा और और वो भी हमारे अपने शिकोहाबाद के
उसी रास्ते पर , वही अपना पक्के तालाब से तहसील तिराये होते हुये
बीडीएम गर्ल्स कॉलेज को जाने वाला रास्ता । मेरी और उसकी उम्र मे
कोई ज्यादा फर्क नहीं लग रहा था । मे जिंदगी के उस हसीन लम्हे मे
दाखिल हो चुका था और वो दाखिल होने की कगार पर थी । वो उस
दिन भी मासूम थी वो आज भी उतनी ही मासूम है या हो सकता है ये
सिर्फ मेरे दिमाग की कल्पना हो । दरअसल बो खिलने वाले उन फूलों
की तरह है जो कभी मुरझाते ही नहीं और ना हीं जिनकी खुसबु फीकी
पड़ती है ।उस दिन जब पहली बार मैंने उसे देखा था शायद मेरी जिंदगी
का अब तक का सबसे हसीन लम्हा रहा होगा और शायद खुसनसीब भी।

हर रोज की तरह हम अपनी भौतिकी की टूयूसन से वापस आ रहे थे,
उधर शंभू नगर की तरफ से ही और वो जस्ट तहसील तिराहे से बीडीएम
वाले रोड पर टर्न ले रही थी । न जाने कैसे मेरी चलती-फिरती सादारण
सी नजर उस पर पड गयी, औ उसके बाद तो हटी ही नहीं। वेसे जनरली
मिस्टर राज की नजरे कही थमती नहीं है पर हाँ वो नजारा जनरल नहीं
था , साधारण नहीं था शायद इसीलिए हमारे शहशाह दिल ने कमबख्त
आंखो को वही पर फोकस बनाए रखने का आदेश जारी किया । कमबख्त
आंखे भी क्यू न अपने शहशाह के आदेश का पालन करती आखिर उनका
खुद का भी तो फायदा हो रहा था। वो उधर सामने से अपनी नजरो को
झुकाये चली आ रही थी , न तो उन्हे दुनिया की फिकर थी नहीं दुनिया
मे रहने वाले हम जैसे लोगो की या फिर यू कहिए की न तो उन्हे
शिकोहाबाद की फिकर थी और ना हीं यहाँ रहने वाले हम जैसे लोगो की।
बो अपनी पुरानी साइकल पर चली आ रही थी वही जो पहले चला करती
थी 18 इंची हीरो जेट। मे बस उन्हे देखे जा रहा था टकटकी नजर से
और इस पूरे समय मे मैंने अपनी पलक भी नहीं झपकायी ताकि कही मेरा
1 पल का नजारा मुझसे छुट न जाए । और उनकी बात करे तो लगभग
वो भी सेम ही कर रही थी फर्क सिर्फ इतना था की वो नीचे रोड पर
फोकस किए हुये थी और मे उन पर।वो अब मेरे दूसरी साइड से मुझे क्रॉस
करचुकी थी। उसका मुझ पर एक बार ध्यान भी नहीं गया। ध्यान तो बहुत
दूर की बात है उन्हे तो एहसास भी नहीं हुआ की कोई उन पर टकटकी
गड़ाए हुये है।मैंने पीछे मुड़कर देखना मुनासिब न समझा। इतना खूबसूरत
था वो पल की मे चाह रहा था की काश ये मंजर कभी खत्म हीं ना हो।
हो सकता है कि ये उनकीखूबसूरती का जादू हो । पर इतना तो है , था
कुछ न कुछ जरूर जो कि इससे पहले मेरी जिंदगी मे न हुआ था … मे
आशा करता हुआ कि ऐसा लम्हा फिर से आए वहुत जल्द ……… ……
to be continued
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mishra’s lover

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raaj rathore
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